मंदिर और खजाने
प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में धार्मिक स्थलों का बहुत बड़ा महत्व रहा है या ये कहें कि इन धार्मिक स्थलों के कारण ही इतनी विस्तृत संस्कृति को बढने में सहयोग मिला है | इन्ही धार्मिक स्थलों के कारण ही हमारी “अनेकता में एकता” कि बात…

प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में धार्मिक स्थलों का बहुत बड़ा महत्व रहा है या ये कहें कि इन धार्मिक स्थलों के कारण ही इतनी विस्तृत संस्कृति को बढने में सहयोग मिला है | इन्ही धार्मिक स्थलों के कारण ही हमारी “अनेकता में एकता” कि बात सिद्ध हो पाती है | क्यौंकी धार्मिक स्थल जैसे मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, आदि के कारण ही लोग एक दूसरे के करीब आते है और अपने आराध्य कि पूजा अर्चना एक साथ करते है | यही सामाजिक कार्य बदल कर बाद में त्यौहार आदि में बदल गए और हमें मिली एक बहुत ही समृद्ध संस्कृति, जिसपे हमें बहुत गर्व होता है कि हम विस्वा कि सबसे बड़ी भारतीय संस्कृति का हिस्सा हैं |
जैसा कि हमने देखा कि मानवता व संस्कृति के संरक्षण के लिए धार्मिक स्थल कितना महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं | धार्मिक स्थल भी हमारे द्वारा बनाये गए हैं और इनको भी व्यस्थित और सुरक्षित रखना हमारा कर्तव्य और जिम्मेदारी है | अब जैसा कि मंदिर आदि को बनाने में समाज साथ देती है, तो यह भी जरूरी है कि सभी को साथ मिलकर मंदिरों कि व्यस्था भी देखें | अब बात आती है कि कैसे? हर वास्तु चाहे वो व्यक्तिगत कार्य को हो या सामाजिक कार्य को, धन कि जरूरत तो हर जगह होती है | इसी धन की पूर्ती के लिए हमने “दान” की परंपरा बनाई | आरम्भ में तो सारा दान केवल मंदिर की व्यस्था व नए धार्मिक स्थलों को बनाने में उपयोग होता था, पर समय के साथ दान की परिभाषा को लोगों की सोच ने बदल दी | दान को लोगों ने अपनी मान-प्रतिष्ठा के साथ जोड़ लिया और एक प्रकार के भगवान के साथ सौदे से जोड़ लिया की अगर मेरा फलाँ काम हो गया तो इतना दान दूँगा आदि-आदि | इसी कारण अनावश्यक दान आज कई मंदिरों में अनुपयोगी खजानों में तब्दील हो गए हैं | ये मंदिर भारतवर्ष के कई अलग अलग स्थानों पे हैं जहाँ लोग बहुत ही आस्था के साथ मन्नत मांगते और पूरी होने पे दिल खोलकर दान भी देते हैं |
इन्ही कुछ मंदिरों में से केरल का “पद्मनाभन मंदिर” है जो थिरुअनंथापुरम (तिरुवनंतपुरम) में “श्री पद्मनाभस्वामी क्षेत्रम” के नाम से सुप्रसिद्ध है | कहा जाता है की मंदिर की स्थापना इस कल युग की सुरुआत यानी ५००० वर्ष पहले हुई थी, जिसका समय समय पर जीर्णोद्धार होता रहा और ज्ञात अंतिम जीर्णोद्धार त्रवंकोर राज्य के राजा मार्थंड वर्मा के द्वारा सन् १७२९ में हुआ था | इस मंदिर में मूल रूप से भगवन पद्मनाभ यानी विष्णु की पूजा की जाती है |
प्राचीन काल से ही यहाँ खजाने के होने के कयास लगते आ रहे हैं, कहा जाता है की यहाँ त्रवंकोर के महाराजाओं के द्वारा अन्य राज्यों से जीता हुआ धन यहाँ दान कर दिया जाता था | इतिहास के पन्नों में भी दर्ज है की मंदिर के तहखाने में बड़ी मात्र में जवाहरात मौजूद हैं | पहले तो इस अथाह खजाने का जिम्मा महाराजों का होता था और इसे गुप्त रखा जाता था, पर भारत के अंग्रेजों के अधीन होने और भारत के आज़ाद होने के बाद राजाओं की सत्ता को पूर्ण रूप से हटा दिया गया, जिससे इस मंदिर में खजाने होने की बात भी नष्ट हो गयी, अगर किसी को मालूम भी था तो बहुत ही गुप्त रखा गया | सन् २००७ में स्थानीय वकील आनन्द पद्मनाभन के द्वारा किये गए शोध के बाद मंदिर में छुपे हुए खजाने की खोज शुरू की गयी | समाज और सरकारी अफसरों के बीच खोज में पता चला की मंदिर में ७ तिजोरियां हैं जिनमें से छः के दरवाजों को खोला गया, जिसमें से प्राप्त सोना व अन्य बहुमूल्य वस्तुओं की वर्तमान मूल्य ५० हजार करोड़ से भी ऊपर आंकी गयी | सुरक्षा की दृष्टि से सातवाँ दरवाजा नहीं खोला गया, कहा जाता है की उसमें इससे भी कहीं ज्यादा खजाना मौजूद है |
ये तो बस एक छोटा सा उदाहरण मात्र मंदिरों में छुपे हुए खजानों और मंदिरों में बनाये गए तिजोरिओं का | पद्मनाभन मंदिर के जैसे कई मंदिर जैसे तिरुपति बालाजी, शिर्डी साईं बाबा मंदिर, चंद्रशेखरा स्वामी मंदिर (चेन्नई), आदि धार्मिक स्थलों पर भी एसे ही स्वर्ण भण्डार होने की पुष्टि हो चुकी है, जिनकी मूल्य पद्मनाभन स्वामी मंदिर से भी ज्यादा हो सकती है |
सोचने की बात है की इतने सारे स्वर्ण आदि से भरे खजाने हमारे हिन्दुस्तान में है जिसका कोई लिखित रूप से दस्तावेज नहीं है ना ही बनाया गया | ये पहले से ही गुप्त रखे गए, गुप्त रखने के कारण भी हो सकते हैं जैसे अंग्रेजों और मुग़ल शासकों से बचाना, लूट आदि से बचाना | किसी वास्तु को गुप्त रखना ही उसकी सबसे बड़ी सुरक्षा होती है, बात भी सही है पर यदि इस संपत्ति का उपयोग नहीं किया जाये तो रखने का क्या उद्देश्य? इनकी सुरक्षा में अलग बहुत धन खर्च हो जाता है |
मंदिरों में छुपे हुए धन के उपयोग के बारे में भी अलग अलग मत सामने आये हैं | कुछ का मानना है की मंदिर में दिया दान मंदिर की संपत्ति है और इसे मंदिर के ही कार्यों में उपयोग में लाना चाहिए | धार्मिक द्रष्टि से देखें तो ये सही भी है, और वास्तविक में अगर हम भारतीय संस्कृति और मान्यताओ के आधार पर देखें तो ये भी सही है की चाहे कोई व्यक्ति कितना भी असहाय क्योँ ना हो जाये वो मंदिर की संपत्ति और खास तोर पे दान के पैसो का निजी उपयोग नहीं कर सकता |
एक अन्य धारणा यह भी है की मंदिरों के धन को देश व समाज के भलाई में भी उपयोग किया जाना चाहिए, क्यौंकी मंदिर आदि भी समाज के कल्याण के लिए ही बनाये गए हैं और यदि समाज उत्थान में अगर मंदिरों का धन उपयोग में लिया जाता है तो इसमें कोई बुराई नहीं है | यहाँ एक उदाहरण हमारे सामने भी है की एक बार सन् १८५५ में स्थानीय राज्य में आर्थिक संकट आजाने पर वहाँ की सरकार ने इसी पद्मनाभनस्वामी मंदिर से बहुत सारा धन ऋण लिया था | इसी से स्पस्ट होता है की मंदिरों का धन भी समाज के लिए उपयोग में लाया जा सकता है और लाया जाता रहा है |
पर अब वर्तमान परिपेक्ष्य में क्या ये संभव है की हम मंदिरों के इस खजाने का उपयोग करें? कई लोग कहेंगे की इस धन का उपयोग देश के विकास और प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित हुए लोगों के उपयोग में हो सकता है, पर मेरे हिसाब से देश के विकास की जिम्मेदारी उस देश की सरकार का है, एक राजा की जिम्मेदारी बनती है की वह राजकोष से ही अपने देश के नागरिकों की मदद करे और उसी से देश के विकास करे | हाँ वो बात अलग है की अगर मंदिर व्यस्था समिति अगर स्वयं मदद करना चाहे तो अपनी सहमति से एसा कर सकती है, पर देश की सरकार उसे एस करने को बाधित नहीं कर सकती | जैसा की हमने देखा की पहले भी मंदिरों के खजाने का उपयोग राजाओ ने किया है, पर अगर हम उस समय की परिस्थितियों पर गौर करें तो हम पाएंगे की केवल देश की और राजकोष के आर्थिक संकट में आजाने पर ही राजाओं ने धार्मिक स्थलों का धन उपयोग में लिया है |
अब हम भारत के संविधान के परिपेक्ष्य में देखेंगे की क्या एस संभव भी है की भारत सरकार मंदिरों में छिपे या दान दिये गए धन का उपयोग कर सकता है की नहीं? इसका उत्तर एक अन्य उदाहरण से समझने की कोसिस करते हैं, भारत में धार्मिक क्रियाओं और अनुष्ठानों को करने के लिए कोई कर नहीं दिया जाता, और अगर कोई व्यक्ति किसी धार्मिक संस्थान को अपनी कमाई का कुछ हिस्सा दान देता है तो उस हिस्से का उसे कर भी नहीं देना पड़ता (सेक्सन. ८० सी.), यहाँ के नागरिकों से कोई जजिया कर नहीं लिया जाता, यहाँ तक की किसी भी धार्मिक संस्थान को कोई विशेष कर नहीं देना पड़ता | भारत में धार्मिक स्थलों का धन दान का माना जाता है जो भारत सरकार की संपत्ति नहीं मानी जाती (भारतीय मुद्रा को छोड़कर) | जैसा की दान पर सरकार का कोई खास हक नहीं इसी कारण इसे देश के राजकोष में शामिल करने का कोई कारण ही नहीं बनता, तो देश के विकास में केवल राजकोष ही उपयोग में लाया जा सकता है धार्मिक मंदिरों के खजाने का नहीं, इसके अलावा सरकार को मंदिरों के खजाने की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी है |
अब हम अर्थव्यवस्था की दृष्टी से इस पर गौर करते हैं, हमारी भारतीय मुद्रा रुपया पूर्ण रूप से स्वर्ण से बदली हुई है, जिसे अर्थशास्त्र में गोल्ड बैक्ड कर्रेंसी कहा जाता है | स्वर्ण और अन्य मूल्यवान वस्तुओं (जमीन, गौ, जेवर) को वास्तविक धन कहते हैं, अगर देश की प्रचलित मुद्रा का वैश्विक भाव अगर कम भी हो जाए तब भी वास्तविक धन का भाव नहीं गिरता, विपरीत उनका मूल्य और बढ़ जाता है | तो हम स्वयं सोच सकते हैं की अगर हम मंदिर के इस खजाने को राजकोष में डालते हैं तो जनता तक वो रूपये में तब्दील हो के ही आ पायेगी, और अगर वैश्विक मंदी का असर भारतीय मुद्रा पर पड़ा तो कितना घाटा होगा इसका अंदाजा हम नहीं लगा सकते | इस प्रकार अर्थनीति भी यही कहेगी की स्वर्ण भंडारों को आपातकाल के लिए बचा के रखना चाहिए | एक नया उदाहरण लें , काइरो, मिस्र के नेशनल संग्रहालय में कई हजार डालर की स्वर्ण कलाकृतियाँ राखी हुई हैं जो की हमारे मंदिरों में रखे हुए खजाने से भी ज्यादा की हो सकती हैं, फिर भी वो उसे देश के विकास में उपयोग में नहीं ले रहे | अर्थनीति में अचल संपत्ति का उपयोग केवल विपत्ति में ही करने को कहा गया है, और सोना या अन्य खजाने हमारी अचल संपत्ति है | अब हम सोच सकते हैं की जो मंदिरों में जो खजाना प्राप्त हुआ है वो आखिर क्योँ बनाया गया और कहाँ उपयोग करना है |
मंदिरों में मिले अंतः खजाने के बारे में बात करना सही है और ये भी अच्छा है कि हम उसके उपयोग और सुरक्षा के बारे में सोचें | साथ ही हमें उन कारणों के बारे में भी सोचना चाहिए जो भारतीय राजकोष पे असर डाल रहे हैं जैसे काला धन जो कर बचने को जमा किया जाता है और विदेशी बैंको में जमा धन, जो लेन-देन में ना आने से अनुपयोगी हो जाते हैं | मंदिरों के खजानों को हमें अधिक सुरक्षित करने का काम करना चाहिए और यह सबसे अच्छा रहेगा कि हम सही रूप से पूर्ण दस्तावेज बनाये जो खजाने का लेखा जोखा रखे और खजानों को गुप्त भी रखने का प्रयास करें ताकि वो अधिक सुरक्षित रह सकें |
Pic: Padbhnabhanswamy temple, Thiruanantapuram, Kerala
